जनजातीय संस्कृति और कला परम्परा केंद्रित तीन दिवसीय मड़ई उत्सव का समापन
बिलाल खत्री
आलीराजपुर, मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय, भोपाल एवं जिला प्रशासन आलीराजपुर के सहयोग से पुराना पंचायत भवन मैदान, सोण्डवा आलीराजपुर में 25 से 27 अक्टूबर, 2025 तक मड़ई उत्सव का आयोजन किया गया, जिसमें प्रदेश के जनजातीय नृत्य सहित अन्य राज्यों की कला प्रस्तुतियां एवं नृत्य-नाट्य प्रस्तुतियों का संयोजन किया गया है।
उत्सव में 27 अक्टूबर, 2025 को कैलाश सिसोदिया एवं साथी-धार द्वारा भील जनजातीय भगोरिया नृत्य एवं बनसिंह भाईचामायड़ाभाई राठवा एवं साथी-बड़ौदा द्वारा राठवा जनजातीय नृत्य और भीली जलकथा पिथौरा पर एकाग्र समवेत नृत्य नाटिका की प्रस्तुति ख्यात कोरियोग्राफर चंद्रमाधव बारिक, भोपाल के पुनर्संयोजन में दी गई।
प्रस्तुति के अगले क्रम में बनसिंह भाई राठवा एवं साथी, गुजरात द्वारा राठ नृत्य की प्रस्तुति दी। राठवा गुजरात की एक प्रमुख जनजाति है। मध्यप्रदेश की सीमा से लगे गुजरात क्षेत्र में राठवा बहुतायत से निवास करते हैं। राठवा मुख्यत मध्यप्रदेश में भील जनजाति की उपजाति है। गुजरात में भी भील एवं राठवा जनजाति निवास करती हैं। राठवा जनजाति का नृत्य भील जनजाति नृत्य से ज्यादा पृथक तो नहीं है, परन्तु राठवा जनजाति के नृत्य में गति अधिक है। लय एवं ताल के समन्वय में भी गुजरात की छवि को महसूस किया जा सकता है।
समारोह में भीली जलकथा पिथौरा पर एकाग्र समवेत नृत्य नाटिका की प्रस्तुति हुई। प्रस्तुति के माध्यम से बताया कि निमाड़ अंचल में भील जनजाति में पिथौरा एक अनुष्ठानिक मिथक है। यह एक ऐसा चरित्र है, जो घोड़े पर सवार होकर आता है। मन्नत पूरी होने पर भी इसे उत्सव के तौर पर मनाया जाता है। मध्यप्रदेश के झाबुआ, आलीराजपुर सहित अन्य राज्यों के आदिवासी कलाकारों द्वारा पिथौरा चित्रांकन किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि भील जनजाति का एक युवा पिथौरा, जल संकट को हल करने के लिए हिमालय से जल लाता है और पूरे इलाके को सुखी संपन्न करता है। तब से यह जनजाति वर्षा ऋतु में आठ दिनों का उत्सव मनाती है और पिथौरा की पूजा करती है।
इस प्रस्तुति में झाबुआ से शुरू करते हुए हिमालय से जल देव को लेकर आने तक की यात्रा का वर्णन किया गया। पिथौरा के इतिहास को वर्तमान समय में कंटेम्प्रेरी बनाने के लिए सूत्रधार की भूमिका रखी गई एवं इसमें बैले नृत्य शैली का प्रयोग किया गया।






