शेख़ नसीम। नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर हो रहे प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस की कार्रवाई को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। प्रदर्शन में शामिल छात्रों और छात्राओं पर लाठीचार्ज किए जाने, विपक्ष के प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार करने और अब प्रदर्शन की कवरेज कर रहे पत्रकारों को हिरासत में लेने के आरोप सामने आए हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, पत्रकारिता जगत की जानी-मानी पत्रकार प्रज्ञा मिश्रा सहित अन्य पत्रकारों को प्रदर्शन की कवरेज करने से रोका गया। आरोप है कि पुलिस ने उन्हें बलपूर्वक हिरासत में लेकर बस में बैठा दिया। इस दौरान पत्रकार लगातार सवाल करते रहे कि जब वे केवल अपने पत्रकारिता संबंधी दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं, तो उन्हें किस आधार पर हिरासत में लिया जा रहा है।
पत्रकारों का कहना था कि उनके पास माइक और पहचान पत्र मौजूद हैं, इसके बावजूद पुलिस उनकी बात सुनने को तैयार नहीं थी। पत्रकार प्रज्ञा मिश्रा ने वीडियो जारी कर पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि पुलिसकर्मी उन्हें पकड़ने की बात कह रहे थे, जबकि वह बार-बार कह रही थीं कि वह स्वयं चलकर जा सकती हैं। ऐसे में उन्हें जबरन उठाकर ले जाने की क्या आवश्यकता थी?
प्रज्ञा मिश्रा ने यह भी आरोप लगाया कि मौके पर मौजूद कुछ महिला पुलिसकर्मियों की वर्दी पर नेम प्लेट नहीं लगी थी। इन घटनाओं ने प्रदर्शन स्थलों पर पत्रकारों की सुरक्षा, स्वतंत्रता और उनके साथ किए जाने वाले व्यवहार को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की स्वतंत्रता पर सवाल
लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथा स्तंभ माना जाता है। पत्रकारों का दायित्व है कि वे जनता तक घटनाओं की वास्तविक स्थिति पहुंचाएं और सत्ता से जवाबदेही सुनिश्चित करें। ऐसे में यदि किसी प्रदर्शन की कवरेज करने वाले पत्रकारों को ही रोका जाता है या उनके साथ कथित तौर पर अभद्रता की जाती है, तो यह प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर चिंता पैदा करता है।
इस मामले में सवाल उठता है कि पत्रकारों को किस कानूनी आधार पर हिरासत में लिया गया? क्या उन्हें अपनी बात रखने और घटनास्थल की कवरेज करने का अवसर दिया गया? यदि पुलिस ने नियमों का उल्लंघन किया है, तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध क्या कार्रवाई की जाएगी?
पत्रकारों के साथ कथित दुर्व्यवहार और उन्हें कवरेज से रोकने की घटनाओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। साथ ही, यदि कार्रवाई के दौरान नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान लेने की मांग
इस पूरे मामले में सर्वोच्च न्यायालय से स्वतः संज्ञान लेकर तथ्यों की जांच कराने और यदि पुलिस की ओर से कानून का उल्लंघन पाया जाता है, तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करने की मांग की जा रही है।
लोकतंत्र में असहमति, विरोध प्रदर्शन और स्वतंत्र पत्रकारिता का महत्वपूर्ण स्थान है। कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है, लेकिन इस जिम्मेदारी के निर्वहन में पत्रकारों के अधिकारों और कानून का सम्मान भी आवश्यक है। अब देखना होगा कि इस मामले में संबंधित अधिकारी क्या स्पष्टीकरण देते हैं और पत्रकारों को हिरासत में लेने की कार्रवाई के पीछे क्या आधार था।





