माजिद शेख
बड़वानी/इंदौर हर बरस माहे मोहर्रम उस अज़ीम कुर्बानी का गवाह बनता है जिसकी बदौलत इस्लाम को नई रवानगी मिली । यूं तो इस्लाम के मानने वाले अपनी अपनी अकीदतों से माहे मोहर्रम को मनाते हैं लेकिन दर हकीकत मोहर्रम का महीना उस बलिदान की याद दिलाता हैं जिनसे साबित किया कि हक पर कायम रहना ही इस्लाम है, चाहे उसके लिए अपना परिवार,अपना कुनबा ही क्यों ना कुर्बान करना पड़े । जो जानते हैं उन्हें पता है कि हजरते इमाम हुसैन उस बेमिसाल शख्शियत का नाम है जिन्होंने अपने नाना यानि पैगम्बर मोहम्मद साहब से बचपन में किए अपने वादे को कर्बला के मैदान में अपनी कुर्बानी देने से साथ पूरा किया । दर असल जिसने इस कुर्बानी को देखा,समझा और जाना वो हजरत इमाम हुसैन के किरदार का कायल हो गया । आज भी नाहक यजीद जंग जीत लेने के बाद भी कही अपने नाम तक के वजूद के साथ बाकी नज़र नहीं आता जबकि हक पर कायम रहकर अपना घर, खानदान और सर कुर्बान कर देने वाले हजरत इमाम हुसैन आज भी इंसानी दिलों में धड़कन की तरह धड़कते हुए नज़र आते हैं । और जब मोहर्रम का महीना आता है तो घर घर गली गली में हुसैन जिन्दाबाद की सदाएं जमीनों आसमान को गुंजाने लगती है। आइए मिलकर फिर अल्लाह तआला से दुवा करे कि वो हमें सिर्फ जुबान से ही नहीं बल्कि किरदार से भी सच्चे हुसैनी बनकर इस्लाम की राह पर मजबूती से कायम रहने की तौफीक दे । आमीन ।






