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विपत्ती मे साथ दे वह सच्चा मित्र -पंडित ब्रज किशोर नागर

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मांगीलाल वर्मा

नानपुर -माँ कालिका मंदिर मे श्रीमद भागवत कथा के समापन अवसर पर भगवताचार्य पंडित ब्रजकिशोर नागर ने कृष्ण सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए कहा की कृष्ण सुदामा की मित्रता निस्वार्थ भाव व भक्ति का सबसे सुन्दर उदारहण है!सुदामा ने विचार किया की जब तक आपके पास धन था, तब तक सब रिश्तेदार बनते थे!जब गरीब हो गए तो कोई मेरे पास नहीं आ रहा है!विपत्ति मे साथ दे वे सच्चे मित्र होते है!मांगने पर दे वे मित्रता नहीं हो सकता है!सुदामा अपने मित्र भगवान श्री कृष्ण से द्वारका मिलने के लिए चल पड़े!बगल मे चावल की पोटली, हाथ मे लकड़ी, नंगे पैर थे!सुदामा के पास चरण पादुका तक नहीं थीं!सिर पर पगड़ी बँधी, एक धोती लपेटी, गले मे एक दुपटा और फटेहाल चल दिए!

अपनी पत्नी के कहने पर वे द्वारका के लिए निकल तो गए, मगर मन ही मन विचार कर रहे थे की द्वारकाधीश यह कैसी तुम्हारी लीला है!सुदामा जब सफर तय कर द्वारका नगरी पहुंचे तो उस अनजान शहर मे कन्हैया का पता पूछा गया की कृष्ण कहा रहते तो लोगो ने बताया की सामने महल है व द्वारकाधीश का है वे आगे बढ़े और कन्हैया के द्वार पर पहुंचे तो द्वारपालो से बोला की कन्हैया को सन्देश पंहुचा दो की तुम्हारा मित्र तुमसे मिलने आया है!

आपके राजा द्वारकाधिश का मे बचपन का मित्र हूँ!द्वारपालो के मना करने पर सुदामा ने कई बार मिन्नते की मगर द्वारापाल टालते व धिक्कारते रहे!इस पर पंडित नागर ने सुन्दर भजन अरे द्वारपालो…. कन्हैया से कह दो, के भजन पर श्रोता झूम उठे!दूसरे द्वारपाल से कहा भैय्या श्री कृष्ण मेरे बाल सखा है, परम मित्र है!थोड़ी देर बाद द्वारपाल ने जब भगवान को सन्देश दिया की द्वार पर एक सुदामा नाम का व्यक्ति आया है, आपका मित्र कह रहा है!इतना सुनते ही भगवान नंगे पैर दौड़कर चले आये और सुदामा को गले लगाया!भगवान कृष्ण ने कहा की सुदामा तू धन्य है, तेरी ऐसी स्थिति होने के बाद भी तूने मुझसे कुछ नहीं माँगा!भाभी कैसी है!फटे वस्त्र मे बंधे चावल की पोटली से चावल लिए व एक मुट्ठी मुँह मे फाक लिए तो सुदामा का महल बन गया!पंडित नागर ने कहा की अपने वतन की निंदा नहीं करनी चाहिए या ऐसे स्थान से हट जाना चाहिए!साथ ही अपने धर्म की भी बुराई नहीं करनी चाहिए!अहंकार को जीवन मे कोई स्थान दे!जीवन सदा विनम्रता पूर्वक यापन करना चाहिए!सुन्दर भजन पर पांडाल मे श्रोता कथा मे लीन होकर झूम उठे!कथा के अंत मे गुरूजी ने कहा की नानपुर नगरी मानो ननिहाल लगने लगी है!जो सात दिनों मे आयोजक समिति सहित हम जहाँ ठहरे मनोहर भाई के परिवार ने खूब सेवा की,आयोजक समिति सहित यजमान को धन्यवाद देते हुए कहा की जीवन मे सयोग व वियोग है!आज कथा समापन पर यह वियोग बड़ा कष्टदाई है!आज कथा के समापन अवसर पर यजमान परिवार द्वारा व्यास पीठ से क्षमा याचना कर पोथी का पूजन कर ढ़ोल बाजे के साथ अपने घर ले गए!जहाँ समिति सदस्यों सहित यजमान परिवार द्वारा गरबा रास किया गया!कथा के आरंभ मे स्थानीय दाऊदी बोहरा समाज ने गुरुवर का व्यास पीठ पर शाल श्रींफल से अभिनन्दन किया गया !सभी समाज प्रमुखो सहित पत्रकारों ने भी गुरुवर का स्वागत सम्मान किया गया!

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