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✍️ नशा — एक धीमा ज़हर

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लेखक: साजिद राजधानी (पत्रकार)


नशा किसी को अचानक बर्बाद नहीं करता…
पहले आदत बनता है,
फिर ज़रूरत बनता है,
और आखिर में ज़िंदगी बनकर ज़िंदगी ही खत्म कर देता है।
आज हमारे समाज का सबसे खतरनाक दुश्मन बेरोज़गारी नहीं,
गरीबी नहीं…
नशा है।
एक लड़का जो कभी घर की उम्मीद होता है,
धीरे-धीरे घर का डर बन जाता है।
मां की दुआओं की जगह आहें ले लेती हैं,
और पिता की मेहनत उसकी लत में जल जाती है।
शुरुआत मज़ाक से होती है —
“यार एक बार ट्राय कर”
और अंत अस्पताल, जेल या कब्रिस्तान में।
नशा सिर्फ शरीर को नहीं खाता,
ये इज़्ज़त, रिश्ते, ईमान और भविष्य सब निगल जाता है।
सबसे दुखद बात ये नहीं कि युवा नशा कर रहे हैं…
दुखद बात ये है कि समाज चुप है।
हम किसी की शादी में हजारों खर्च कर देते हैं,
लेकिन मोहल्ले के एक लड़के को बचाने की कोशिश नहीं करते।
याद रखिए —
नशेड़ी पैदा नहीं होते,
बनाए जाते हैं
बुरी संगत से,
लापरवाही से,
और हमारी खामोशी से।
आज हर पिता अपने बेटे से बात करे,
हर दोस्त अपने दोस्त को रोके,
हर मोहल्ला एक बच्चे की जिम्मेदारी ले…
तो नशा खुद खत्म हो जाएगा।
क्योंकि पुलिस से पहले
समाज जागता है
तो बर्बादी रुकती है।
आइए कसम लें —
नशा करने वाले को छोड़ेंगे नहीं,
और नशा बेचने वाले को छुपने नहीं देंगे।
क्योंकि
एक नशेड़ी सिर्फ अपनी जिंदगी नहीं, पूरी पीढ़ी बर्बाद करता है

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