धार ब्यूरो चीफ इकबाल खत्री
कुक्षी – ब्रजवासी गवली समाज द्वारा इस वर्ष भुजरियां पर्व सभी समाजजनों द्वारा व मातृ शक्ति द्वारा शांति व सदभावना के साथ मनाया गया।
नागपंचमी से प्रारंभ होकर रक्षाबंधन के दूसरे दिन तक चलने वाला यह भुजरियां पर्व नगर में आपसी भाईचारे और सद्भावना के प्रतीक के रूप में सदियों से मनाया जाता आ रहा है। समाजजन इसे आज भी बड़े उत्साह और उल्लास के साथ मनाते हैं। यह पर्व न केवल प्रकृति प्रेम का प्रतीक है, बल्कि खुशहाली और समृद्धि की कामना के लिए भी मनाया जाता है।
सावन के महीने की अष्टमी और नवमीं को छोटी-छोटी बांस की टोकरियों में मिट्टी बिछाकर गेहूं या जौं के दाने बोए जाते हैं। इन्हें नियमित रूप से पानी दिया जाता है, और लगभग एक सप्ताह में ये ज्वारे अंकुरित हो जाते हैं, जिन्हें ‘भुजरिया’ कहा जाता है। सावन में इन ज्वारों को झूला देने की परंपरा भी है, जो हमारी संस्कृति में प्रकृति से जुड़े रहने का प्रतीक है।
भुजरिया पर्व न केवल हमारी सांस्कृतिक धरोहर है बल्कि यह हमारे प्रकृति प्रेम और परंपराओं के प्रति सम्मान भी है। गवली समाज के सभी छोटे बड़े समाजजनों द्वारा रक्षाबंधन के अगले दिन प्रतिपदा पर मनाया जाने वाला यह भुजरियां त्यौहार सभी समाजजनों में आपसी भाईचारे का प्रतीक है। जिसे सभी समाजजनों द्वारा इस भुजरियां पर्व पर ज्वारों के पूजन के साथ ही मिष्ठान का भोग लगाकर विसर्जन के साथ ही विदाई दी गई व सभी सामाजिक भाइयों ने एक दूसरे के गले लग कर और पैर छूकर सभी को भुजरियां पर्व की बधाई व शुभकामनाएं देकर यह पर्व शांति व सदभावना के साथ मनाया गया।





